360 मंदिराें के बीच नीलकंठ महादेव: ​​​​​​​सरिस्का में पांडवाें ने अज्ञातवास के दाैरान बनावाया मंदिर, मुगल शासकाें ने मूतिर्याें काे खण्डित कराया लेकिन, महादेव की महिमा न्यारी


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अलवर26 मिनट पहले

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ये है नीलकंठ महादेव मंदिर।

सरिस्का अभ्यारण्य के कोर एरिया में अरावली की ऊंची पहाड़ी व जंगल के बीच में बसे गढ़ राजौर गांव में 360 मंदिरों के बीच है नीलकंठ महादेव का मंदिर। पूरी तरह नीले पत्थर पर शिवलिंग है। आसपास बने अनेक मंदिरों को लेकर कई किदवंतियां हैं तो इतिहास आलेखों में भी कई रोचक तथ्य हैं। जिससे जानकर आप भी सरिस्का में टाइगर देखने के अलावा गढ़ राजौर गांव में नीलकण्ड महादेव मंदिर भी आने से नहीं रह सकेंगे।

पाण्डवों ने अज्ञातवास के समय बनाया
ग्रामीणों के अनुसार गढ़ नीलकंठ महादेव मंदिर को पाण्डवों ने अज्ञातवास के दौरान बनवाया था। मंदिर पाण्डवों के समय का बना हुआ है। लेकिन, निर्माण को लेकर कुछ अलग-अलग बातें भी हैं। तभी तो इसे करीब साढ़े पांच हजार साल पुराना बताया जाता है। हालांकि ग्रामीणों के पास इसकी सत्यता के स्रोत नहीं है। यह सब एक दूसरे को बताते आ रहे हैं।

महाशिवरात्रि के दिन मंदिर में इस तरह बच्चे भी दण्डौती लगाते हुए पहुंचे। मंदिर में शिव का अभिषेक करते भक्त।

महाशिवरात्रि के दिन मंदिर में इस तरह बच्चे भी दण्डौती लगाते हुए पहुंचे। मंदिर में शिव का अभिषेक करते भक्त।

फिर औरंगजेबन ने मूर्तियों को खण्डित कराया
ग्रामीण बताते हैं कि पाण्डवो के बाद मुगल शासकों ने पूरे भारत वर्ष में मंदिरों को तुड़वाया था। उसी समय गढ़ नीलकण्ठ सहित आसपास के 360 मंदिरों की मूर्तियों को खण्डित कर दिया था। अब भी नीलकण्ठ महादेव मंदिर के आसपा करीब 7 मंदिर बने हुए हैं। लेकिन, छोटे मंदिर नहीं है। आज भी इस क्षेत्र में मंदिरों की मूर्तियां खूब हैं।

खासियत: मूर्तियां और नक्काशी
महादेव मंदिर की दीवारों की नक्काशी बेहद महीन हैं। दीवारों में भी देवताओं की मूर्तियां लगी हैं। चारों तरफ ऊंची-ऊंची अरावली की पहाड़ियां है। सरिस्का का यह कोर एरिया है। मतलब टाइगर का काफी मूवमेंट रहता है। ग्रामीण अन्य गांवों की तरह यहां रहते हैं। लेकिन, महादेव के मंदिर के प्रति उनकी गहरी आस्था है। यहां की मूर्तियां अलवर के म्यूजियम में भी हैं। वहां भी रखी हुई हैं।

दण्डौती देते मिले बच्चे, महिला और बड़े
महाशिवरात्रि के पर्व के दिन तो यहां का नजारा ही अलग मिला। बच्चों से लेकर बड़े और महिला पुरुष दण्डौती देते हुए महादेव के दर्शन करने दूध का अभिषेक करने आते रहे। ग्रामीणों ने कहा कि महादेव से मन की मुराद पूरी होती है। कोई नौकरी तो कोई काम धंधे की कामना करता है। ग्रामीणों के पास खेती व पशुपालन का मुख्य रोजगार है।

महंत ने बताया नीले पत्थर के महादेव
मंदिर के जोगी महंत ने बताया कि शिवलिंग नीले पत्थर का बना है। इसलिए नीलकंठ के नाम से जाना गया। यहां 360 छोटे बड़े मंदिर थे। मुगल शासक औरंगजेब ने मूर्तियों को खण्डित किया गया था। उस समय नीलकंठ महादेव की मूर्ति पूरी बची थी। बाकी अधिकतर खण्डित कर दी गई थी। मंदिर के पट शाम की आरती के बाद ही बंद किए जाते हैं। महाशिवरात्रि वाली रात को खुला रहता है।

इतिहासविद् हरीशंकर गोयल के अनुसार किदवंतियां ज्यादा
इतिहासविद् हरीशंकर गोयल के अनुसार राजपूतों की बही के हिसाब गढ़ राजौर गांव 602 से शुरू होता है। ऐतिहासिक रूप से यहां 24 मंदिर थे। जिसमें से 7 मंदिर अब भी मौजूद हैं। जिसमें से भगवान शिव का मंदिर 959 ई में बना था। दूसरा महादेव से पहले 922 में यहां जैन मंदिर होने का उल्लेख है। जैन मंदिर भी काफी विशाल था। यहां शिवजी के चार अन्य और हुनमानजी का मंदिर भी है। इसके शिलालेख अजमेर में और अलवर के म्यूजियम में है। शिव-पार्वती की 11वीं शताब्दी की मूर्ति म्यूजियम में रखी है। यहां की 2 हजार 826 मूर्तियां मौजूद हैं। यहां जाने का रास्ता टहला से होकर जाता है। मुख्य गेट पर राघवों की कुल देवी का मंदिर है। कभी राजा सवाई जयसिंह ने यहां से लेकर कांकवाड़ी किले को शामिल करते हुए दीवार का निर्माण कराया था।

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