जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल 2021 LIVE: प्रसून जोशी ने कहा- लोक संगीत बार-बार सुनने के बावजूद पुराना नहीं पड़ता है, यह वह पत्थर है जो बेहद तराशा हुआ है


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19 मिनट पहले

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जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल 2021 के वर्चुअल आयोजन में गीतकार प्रसून जोशी व गायिका विद्या शाह।

  • जेएलएफ में शास्त्रीय, लोक और पॉपुलर संगीत पर चल रहा है सेशन

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की शुक्रवार को वर्चुअल शुरुआत हो गई। दुनिया के सबसे बड़े और लोकप्रिय साहित्य कुंभ के इस आयोजन के पहले सत्र की शुरुआत जाने-माने गीतकार प्रसून जोशी और शास्त्रीय गायिका विद्या शाह के सेशन की हुई है। शास्त्रीय, लोक और लोकप्रिय संगीत पर चल रहे इस सेशन में लोक संगीत का बोलबाला अभी तक सुनाई दे रहा है।

सेशन में मॉडरेटर के रूप में विद्या शाह के प्रश्नों का गीतकार प्रसून जोशी बेहद खूबसूरती के साथ लोक संगीत का बखान कर रहे हैं। प्रसून ने कहा- लोक संगीत बार-बार सुनने के बावजूद पुराना नहीं पड़ता है। वह एक पत्थर है जो एक हाथ से दूसरे हाथ में जाता है, लेकिन वह एक ही हाथ में कूटा न जाए। क्योंकि ऐसा होने पर उसकी खूबसूरती है, ये अगर उन्हीं लोेगों के हाथ में रहती है, जिनसे उनको प्यार है, तो उसकी खूबसूरती और बढ़ती है। यदि वह गलत हाथों में पड़ जाता है, तो बुरा होता है। मैंने एक शब्द का प्रयाेग किया था, पाठशाला, पहले सोचा कि उसे लोग नहीं समझेंगे, लेकिन लोग समझने लगे। ऐसे ही लोक संगीत में कोई मिलावट करे तो वह नहीं चलेगा।

प्रसून ने कहा- राग पहाड़ी का जन्म तो कहीं पहाड़ों से ही हुआ है। चाहे उसे लोक में सुनें या क्लासिकल में सुनें। यह कई अलग-अलग रूप में मिलेगा। बात यह है कि लोक संगीत इतना हाथों-हाथ लिया जाता है। आपके मन-मस्तिष्क में घुस जाता है। यह वास्तव में हमारी आत्मा है। यह वह पत्थर है जो बेहद तराशा हुआ है। वह सदियों से एक चट्‌टान से घिसता हुआ आता है। वह इतने लोगों के हाथों से गुजरता है, जिसके अंतत: उसमें गहराई आ जाती है।

विद्या शाह ने कहा कि लोक संगीत की उपस्थिति हिन्दुस्तानी संगीत की दुनिया में जो रही है, उसमें 200 साल पहले ठुमरी-दादरा की जाती थी। लोक संगीत इतनी तराशी क्यों है, इसकी वजह यही हो सकती है कि वह हर जनता के लिए, हर जनता की है। संगीत की दुनिया में भी जहां थीम हैं, वे शास्त्रीय संगीत में भी शामिल हैं। इसके प्रसंग भी बेहद सुंदर हैं।

इस पर प्रसून ने कहा – एक चीज समझने की आवश्यकता है। संगीत में कहीं उसमें एक सामूहिक अवचेतन है, एक सामूहिक क्रिएशन है। जब भी आप अपनी छाप छोड़ने की बात करते हैं। उसमें एक अलग चीज आती है। मैं इसके इगो पार्ट की आलोचना नहीं कर रहा, लेकिन यह इसकी सुंदरता है। एक आदमी कितना तराश सकता है। जब एक से दूसरे दूसरे से तीसरे तक जाता है, तो उसकी जो आशा होती है, तो उसकी चमक रिफ्लेक्ट होती है।

मैं इन दिनों ठुमरी पर काम कर रहा हूं। उसमें भी लोक संगीत का अंश है। इसका एक और रूप था। उस संस्कृति का रक्षा कवच कह सकते हैं। हमारी परंपरा जिंदा रही हैं आज, वो शोख गीतों की वजह से रही हैं। फसल और जमीन के लिए क्या-क्या करना चाहिए, यह आपको गीतों में मिलता है। श्रम गीत- जैसे जोर लगाकर होई श्या, बाल गीत, तीज त्योहारों से जुड़े गीत होते थे। जो हमारे जीवन को परिलक्षित करता था। यह लोक, खुशी, उल्लास, दुख आदि सभी है। इसका एक अंश उठाकर उसे लोक कह देना, यह उचित नहीं होगा।

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