जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में विधु विनोद चौपड़ा: जब डायरेक्टर फिल्म पर आवश्यकता से ज्यादा पैसा खर्च करता है तो उसकी स्वंतत्रता पर रोक लग जाती है


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जयपुर4 मिनट पहले

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जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के ऑनलाइन सेशन में चर्चा करते विधू विनोद चोपड़ा , अभिजात जोशी व वाणी त्रिपाठी।

  • अनस्क्रिप्टिड स्पीकर्स : विधू विनोद चोपड़ा , अभिजात जोशी व वाणी त्रिपाठी

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के एक सेशन में शनिवार को अनस्क्रिप्टिड सेशन में डायरेक्टर, स्क्रीन राइटर व प्रड्यूसर विधु विनोद चोपड़ा व स्क्रीन राइटर अभिजात जोशी ने शिरकत की। उन्होंने कहा- स्वीडिश फिल्म मेकर इंगमार बर्गमैन की तीन आज्ञाओं का मैं पालन करता है। पहला, अपनी फिल्म के माध्यम से एंटरटेन करो।दूसरा, एंटरटेन करो लेकिन अपने प्राण, आत्मा बेच कर नहीं। तीसरा, फिल्म ऐसी बनाओ जैसी ये आपकी आखिरी फिल्म हो। मेरा जीवन इन तीन नियमों पर आधारित है। यही कारण है मैं सोशल मीडिया पर नहीं हूं। वहां अपनी अलग और बेहद खुद इमेज दर्शानी होती है। लेकिन वो समाप्त होने के बाद क्या? असल जीवन, जो दुख से भरा है। मैं 68 का हूं और बेहद खुश व संतुष्ट। क्योंकि कोई इमेज नहीं बना कर रखनी।

विधु विनोद चोपड़ा ने जेएलएफ के दूसरे दिन, शनिवार को अनस्क्रिप्टिड सेशन में अपने जीवन से जुड़े रोचक किस्से साझा किए। सेशन में इनके साथ स्क्रीन राइटर व विधु विनोद चोपड़ा के अच्छे दोस्त अभिजात जोशी भी शामिल रहे। सेशन को मॉडरेट एक्टर वाणी त्रिपाठी टिक्कू ने किया।

लालकृष्ण आडवाणी के साथ पहली मुलाकात

विधु विनोद चोपड़ा को विज्ञान भवन में अवॉर्ड के लिए आमंत्रित किया गया। जहां उन्हें अवॉर्ड में 4 हजार रुपए मिलने वाले थे, लेकिन मंच पर लाल कृष्ण आडवाणी ने नकद पैसे की जगह लिफाफे में बंद बॉन्ड दिया। विधु विनोद चोपड़ा ने बताया, मैं कश्मीर के मध्यम वर्गीय परिवार से आता हूं। उस समय पैसे की जरूरत थी। मुझे लगा नोट्स से भरा मोटा लिफाफा होगा लेकिन वो बहुत पतला निकला। मैं मंच पर ही उनसे पूछने लगा, आपने तो पैसे का वादा किया था। इसका क्या करुं। मुझे पैसे दो। ये पूरा वाक्या लाइव दूरदर्शन पर प्रसारित हो रहा था और मेरी उनसे बेहस जारी थी। जितने रुपए उधार लिए थे वो तो आने में लग गए। डिनर, अगले दिन का नाश्ता तो उन पैसों से आता। उन्होंने मुझे कहा भी कि कल ऑफिस आ जाना, वहां मिल जाएंगे। जैसे-तैसे मैं माना। अगले दिन जब पहुंचा तो उन्होंने पूछा नाश्ता किया है? मैंने कहा नहीं, कल पैसे ही नहीं मिले। फिर उन्होंने नाश्ता कराया और हमारी बातचीत हुई।जरूरत से ज्यादा फिल्म पर पैसा लगाने से आपकी स्वतंत्रता जाती हैचोपड़ा ने कहा, मुझे देखो, मैं पार्टी नहीं करता, खुद का अवॉर्ड लेने नहीं जाता। इंडस्ट्री के आधे लोग मुझे नहीं पसंद और आधे मुझे नहीं पसंद करते। इसलिए मेरा काम अच्छे से चल जाता है। अगर आप जरूरत से ज्यादा निवेश करेंगे तो समझौता करना पड़ेगा। न नकली दोस्त बनने की फिक्र, न मन मौजी होने से कोई रोक लगा सकता है। यही फिल्मों पर भी लागू होता है।

उन्होंने आगे 1986 में आई खामोश से जुड़ा किस्सा सांझा किया कि कुंदन शाह व रणजीत कपूर नसीरुद्दीन शाह की एंट्री में बस को उल्टा गिराना चाहते थे। लेकिन इनका सोचना था कि बस के पैसे कहा से आएंगे। चोपड़ा ने बताया, मैंने कहा यह फजूल का खर्चा है। बात मेरी ही मानी गई। जो सही निर्णय था। असल में कलाकार को पैसे का सोचना पढ़ता है। जब डायरेक्टर फिल्म पर आवश्यकता से ज्यादा पैसा खर्च करता है तो उसकी स्वंतत्रता पर रोक लग जाती है। आपको अपनी कला से समझौता करना पड़ता है। 200 करोड़ से ऊपर जाते ही वो सीन को रोचक बनाने की कोशिश करता है। जो बाद में बिक सके। शिकार फिल्म में मुझे कश्मीर दर्शाना था तो उसे बनाने में 3 इडियट्स जितना पैसा लग गया। क्योंकि मुझे वो दृश्य दर्शाने की जरूरत लगी थी।जीवन सिनेमा से ज्यादा बड़ा हैअलग-अलग जॉनर्स पर फिल्म बनाने पर डायरेक्टर ने कहा, क्या आप रोज कश्मीरी खाना खा सकते हो? नहीं न अबाउ हो जाता है। तो एक ही थीम पर फिल्म क्यों बनाई जाए। बचपन में पापा को जब मैंने कहा था कि मुझे डायरेक्टर बनना है तो उन्होंने पहले कहा डायरेक्टर और तू, कहां मुंबई जाकर फिल्में बनाएगा। लेकिन बाद में उन्होंने कहा, मोची बन जा। लेकिन सबसे अच्छा मोची बनना। मैं अब भी यही मानता हूं इसलिए एक जगह रुकने की बजाए अपने काम को बेहतरीन बनाने पर ध्यान देता हूं।

रिपोर्ट : बकुल महेश, जयपुर

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