कांग्रेस का मिसमैनेजमेंट: राहुल गांधी की रैली से खुद को स्थापित करने का मौका गंवाया डोटासरा ने, पहले से ही PCC के गठन पर उठ रहे थे सवाल


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जयपुर6 मिनट पहले

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राहुल गांधी की एक सभा में मंच पर टूट गई थी खाट।

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के दो दिन के दौरे के बाद अब पीसीसी के मिस मैनेजमेंट को लेकर सवाल उठ रहे हैं। सभाओं में उम्मीद से बेहद कम संख्या, खाट टूटना, मंच संचालन में गफलत जैसे मामले तो चर्चा का विषय बने हुए ही हैं, कई बार ऐसी स्थितियां भी पैदा हुईं, जिसके कारण कांग्रेस का मैनेजमेंट हंसी का पात्र बना। पूरे दौरे के समय खुद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ऊक-चूक होते दिखाई दिए। अव्वल जिस रैली से कांग्रेस को करीब 1 लाख लोगों की भीड़ जुटने की उम्मीद थी, उसके सभा स्थलों को ट्रैक्टरों से भी भरा नहीं जा सका।

राहुल गांधी के दौरे के इस मिस मैनेजमेंट को लेकर प्रदेश कांग्रेस में अब घमासान मचा है। अपनी पार्टी में प्रदेश कांग्रेस कमेटी के गठन के बाद से कमेटी के स्तर पर लगातार सवाल खड़े होते रहे हैं। कांग्रेस के बड़े नेताओं का मानना है कि इसी तरह के सवालों से घिरे प्रदेशाध्यक्ष डोटासरा के पास राहुल गांधी का यह दौरा तुरूप का इक्का साबित हो सकता था। वे अपने प्रदेशाध्यक्ष के पद को इन चार सभाओं से जस्टीफाई करा सकते थे। खुद को स्थापित करने के लिए डोटासरा को जो करना चाहिए था, वे इसमें उचित प्रबंधन नहीं कर पाए।

समय पर नहीं बांटी जिम्मेदारी

राहुल गांधी के दौरे को लेकर कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा काफी कैजुअल दिखाई दिए। पीसीसी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस में इस बात को लेकर चर्चा जोरों पर है कि पार्टी को लग रहा था कि जिन स्थानाें पर सभाएं होने जा रही हैं, वहां किसान बड़ी संख्या में स्वत: ही चलकर आ जाएंगे। अव्वल यह भी चर्चा का विषय बन रहा है कि जिस दिन दौरा तय हुआ था, उसके कई दिन बाद तक भी प्रदेशाध्यक्ष ने संबंधित जिलों में जाकर जिम्मेदारी तक नहीं सौंपी थी। ऐसे में जो काम प्रदेश कांग्रेस को करना चाहिए था, वो हो नहीं पाया। जिलों के पदाधिकारियों को और विधायकों को यह भी अंतिम समय पर पता चला कि कौन क्या-क्या करेगा। ऐसी स्थिति में भीड़ से लेकर अन्य काम पर मिस मैनेजमेंट साफ तौर पर दिखाई दिया।

दोनों सीमावर्ती राज्यों में सत्ता में, फिर भी सभा में नहीं पहुंचे किसान

कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ दोनों जिले पंजाब से सटे हैं। राजस्थान और पंजाब में कांग्रेस की ही सरकार है। इसके बावजूद इन जिलों के किसान तो उतनी संख्या में आए ही नहीं, वैकल्पिक तौर पर पंजाब से भी ऐसी व्यवस्था पार्टी नहीं कर पाई। यह भी बात सामने आई कि राहुल गांधी की रैली के दो दिन पहले ही हनुमानगढ़ में किसान नेता गुरनाम सिंह चडूनी किसान सभा करके गए थे। बताया तो यह भी जा रहा है कि उनकी रैली में ही राहुल की रैली से ज्यादा किसान थे। अब कांग्रेस इस बात पर अफसोस मना रही है कि रैली का स्थान गलत चुन लिया। हनुमानगढ़ में जब एक रैली में किसान आ गए तो वे दूसरे दिन ही दूसरी रैली में नहीं पहुंचे। कांग्रेस के स्थानीय नेता कुछ इसी तरह के तर्क दे रहे हैं।

पॉलिटिकल मैनेजमेंट में लगी रही पीसीसी

एक और बात सामने आ रही है। कहा जा रहा है कि पीसीसी अध्यक्ष खुद को राहुल गांधी के सामने साबित करने की कोशिश में व्यवस्था संबंधी मैनेजमेंट के बजाय पॉलिटिकल मैनेजमेंट में लगे रहे। उनकी नजर इस बात पर ज्यादा टिकी थी कि कोई नेता राहुल गांधी के इर्द-गिर्द न जा पाए। उनकी बराबर कोशिश रही कि किसी भी तरह राहुल गांधी के समीप वे खुद सीएम अशोक गहलोत के अलावा कोई और न पहुंचे। यही कारण था कि जो व्यवस्था पीसीसी चीफ को देखनी चाहिए थी वे पूरी तरह देख नहीं पाए। मंच पर कई बार मंच संचालन की खामी साफतौर पर दिखाई दी। एक सभा में राहुल गांधी के भाषण से पहले एक अनजान कवि को ही आमंत्रित कर दिया गया। खुद राहुल गांधी तुकबंदी को सुनकर हैरान दिखाई दिए। मंच पर ही खाट टूटना भी अपने आप में खराब मैनेजमेंट की निशानी थी। मंच पर कोई भी चढ़ रहा था, इसे लेकर भी अव्यवस्था सामने आई। अंतत: रूपनगढ़ की सभा में तो डोटासरा को खुद बोलना पड़ा, सीएम साहब और राहुल जी के अलावा सभी नीचे उतर जाएं। मैं भी उतर रहा हूं।

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